युद्धभूमि का संकट
लंका के युद्ध में मेघनाद के शक्तिशाली अस्त्र से लक्ष्मण जी मूर्छित होकर गिर पड़े। श्री राम अत्यंत व्याकुल हुए। वैद्य सुषेण ने बताया कि हिमालय के एक पर्वत पर संजीवनी सहित कुछ विशेष औषधियाँ हैं, जिन्हें रात समाप्त होने से पहले लाना आवश्यक है।
हनुमान जी ने आदेश की प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने श्री राम को प्रणाम किया और औषधि लाने के लिए आकाश मार्ग से निकल पड़े। उनके लिए यह केवल युद्ध की आवश्यकता नहीं, अपने प्रभु के प्रिय भाई की रक्षा का दायित्व था।
समय से तेज सेवा
हनुमान जी ने पर्वत और वन पार किए। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों ने उनके संकल्प को नहीं रोका। वे जानते थे कि औषधि समय पर न पहुँची तो लक्ष्मण जी का जीवन संकट में पड़ सकता है।
जब वे उस पर्वत पर पहुँचे तो अनेक औषधियों में संजीवनी को पहचानना कठिन लगा। समय कम था और अनुमान से गलत औषधि चुनना उचित नहीं था। इसलिए हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और लंका की ओर लौट चले।
लक्ष्मण जी का पुनर्जीवन
पर्वत के पहुँचते ही वैद्य ने आवश्यक औषधि पहचानकर उसका प्रयोग किया। लक्ष्मण जी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। श्री राम के हृदय में आनंद लौट आया और पूरी वानर सेना ने हनुमान जी की सेवा का सम्मान किया।
हनुमान जी ने इस कार्य का श्रेय स्वयं नहीं लिया। उनके लिए यह श्री राम की आज्ञा और सेवा का अवसर था। यही निस्वार्थता उनकी शक्ति को और महान बनाती है।
कथा का संदेश
संजीवनी की कथा हमें निर्णय लेने, समय का मूल्य समझने और सेवा में पूरी क्षमता लगाने की प्रेरणा देती है। जब किसी के जीवन और कल्याण का प्रश्न हो, तब आधे-अधूरे प्रयास के बजाय समर्पित कर्म आवश्यक है।
“सच्ची सेवा वही है जिसमें अपना श्रेय पीछे और दूसरे का जीवन आगे दिखाई दे।”